जहां चाह वहां राह

जहां चाह वहां राह वाली कहावत आज भी प्रसंगिक है. पुराने लोग कहते थे कि अगर आप ठान लें कि आपको समाज के लिए कुछ करना है, तो न तो आपको संसाधनों की कमी रहेगी और न ही आपकी शारीरिक कमजोरी इसमें बाधा बनेगी. इसके लिए आपका समर्पण और जुनून ही काफी है. सीवान के अनिल कुमार मिश्रा ने ऐसा ही कुछ कर दिखाया है.
अनिल खुद तो मूक-बधिर हैं लेकिन उनके द्वारा किया जा रहा शिक्षा दान न जाने कितने सूरदासों के लिए ‘आंख’ तो मूक व्यक्तियों के लिए ‘जुबान’ बन गया है. सीवान जिले के गोरियाकोठी प्रखंड के हरपुर गांव निवासी अनिल जन्म से ही मूक-बधिर हैं. इस कारण उनके जन्म लेने की खुशी तो उनके घर में नहीं मनी थी परंतु बकौल अनिल उनके पिता रामदयाल मिश्र ने उन्हें अच्छी शिक्षा देने का मन अवश्य बना लिया था.
अनिल अपनी बातें इशारों में बताते हैं. उनका कहना है कि उनके पिता ने बड़े उत्साह के साथ उनकी पढ़ाई की शुरुआत करवाई थी. समाज और परिजनों के विरोध के बावजूद भी पटना के एक मूक-बधिर विद्यालय में उनका नामांकन करवाया गया. शुरुआत में तो उन्हें भी कुछ समझ में नहीं आता था लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना लिया.
जब पटना में इस मूक-बधिर ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली तो उन्होंने अपनी ही तरह शारीरिक रूप से कमजोर दूसरे लोगों को सम्बल देने के लिए आगे आने की ठान ली. उनके एक मित्र ने बताया कि उनका मानना था कि पटना जैसे बड़े शहरों में तो मूक-बधिरों को पढ़ाने के लिए कई विद्यालय हैं परंतु सीवान के लोगों के लिए कुछ नहीं है. इसलिए वर्ष 1990 में उन्होंने पटना छोड़कर अपनी जन्मभूमि सीवान को ही अपनी कर्मभूमि बनाने का निर्णय लिया. उन्होंने यहां एक मूक-बधिर विद्यालय खोलने का मन बनाया लेकिन इसमें काफी मुश्किलें थीं. इस दौरान उनकी मुलाकात शहर के एक समाजसेवी रतनलाल खेतान से हुई.

उन्होंने विद्यालय के लिए अनिल को कुछ भूमि दान देने का निर्णय लिया और फिर अनिल के विद्यालय की शुरुआत हो गई. आज उनके विद्यालय में गोपालगंज, सीवान, छपरा सहित कई जिलों के मूक-बधिर छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं जबकि यहां से शिक्षित कई छात्र अपनी रोजी-रोटी चलाने में व्यस्त हो गए हैं. गौरतलब है कि अनिल अपने छात्रों की शिक्षा में राष्ट्रीयता की भावना भी विकसित करते हैं.
इस विद्यालय को न तो अब तक कोई सरकारी सहायता मिली है और न ही कभी कोई प्रशासनिक सहयोग ही मिला है लेकिन स्थानीय लोगों का सहयोग बदस्तूर जारी है. विद्यालय में एक हजार से ज्यादा मूक-बधिर अक्षर ज्ञान ले रहे हैं. अनिल शारीरिक रूप से विकलांग अधिक से अधिक लोगों को शिक्षा दान देना चाहते हैं. एजेंसी

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