राष्ट्रभाषा के लिए

  • महात्मा गाँधी राष्ट्र के लिए राष्ट्रभाषा को नितांत आवश्यक मानते थे। उनका कहना था, “राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।” गाँधीजी हिन्दी के प्रश्न को स्वराज का प्रश्न मानते थे— “हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।” उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में सामने रखकर भाषा–समस्या पर गम्भीरता से विचार किया। 1917 ई. में भड़ौंच में आयोजित गुजरात शिक्षा परिषद के अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए गाँधीजी ने कहा,

राष्ट्रभाषा के लिए 5 लक्षण या शर्तें होनी चाहिए

  1. अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।
  2. यह ज़रूरी है कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों।
  3. उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का अपनी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवहार होना चाहिए।
  4. राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।
  5. उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्पस्थायी स्थिति पर ज़ोर नहीं देना चाहिए।”
वर्ष 1918 ई. में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए गाँधी जी ने राष्ट्रभाषा हिन्दी का समर्थन किया, “मेरा यह मत है कि हिन्दी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।” इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिन्दी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएँ और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएँ सीखने तथा हिन्दी का प्रसार करने के लिए दक्षिण भारत में भेजा जाए। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिन्दी के कार्य को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिन्दी प्रचारक के रूप में गाँधीजी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गाँधी को दक्षिण में चेन्नई भेजा। गाँधीजी की प्रेरणा से मद्रास (1927 ई.) एवं वर्धा (1936 ई.) में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएँ स्थापित की गईं।
  • वर्ष 1925 ई. में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में गाँधीजी की प्रेरणा से यह प्रस्ताव पारित हुआ कि ‘कांग्रेस का, कांग्रेस की महासमिति का और कार्यकारिणी समिति का काम–काज आमतौर पर हिन्दी में चलाया जाएगा।’ इस प्रस्ताव में हिन्दी–आंदोलन को बड़ा बल मिला।
  • वर्ष 1927 ई. में गाँधीजी ने लिखा, “वास्तव में ये अंग्रेज़ी में बोलने वाले नेता हैं, जो आम जनता में हमारा काम जल्दी आगे बढ़ने नहीं देते। वे हिन्दी सीखने से इंकार करते हैं, जबकि हिन्दी द्रविड़ प्रदेश में भी तीन महीने के अन्दर सीखी जा सकती है।
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  • वर्ष 1927 ई. में सी. राजागोपालाचारी ने दक्षिण वालों को हिन्दी सीखने की सलाह दी और कहा, “हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा तो है ही, यही जनतंत्रात्मक भारत में राजभाषा भी होगी।”
  • वर्ष 1928 ई. में प्रस्तुत नेहरू रिपोर्ट में भाषा सम्बन्धी सिफ़ारिश में कहा गया था, “देवनागरी अथवा फ़ारसी में लिखी जाने वाली हिन्दुस्तानी भारत की राष्ट्रभाषा होगी, परन्तु कुछ समय के लिए अंग्रेज़ी का उपयोग ज़ारी रहेगा।” सिवाय ‘देवनागरी या फ़ारसी’ की जगह ‘देवनागरी’ तथा ‘हिन्दुस्तानी’ की जगह ‘हिन्दी’ रख देने के अंततः स्वतंत्र भारत के संविधान में इसी मत को अपना लिया गया।
  • वर्ष 1929 ई. में सुभाषचंद्र बोस ने कहा, “प्रान्तीय ईर्ष्या–द्वेष को दूर करने में जितनी सहायता इस हिन्दी प्रचार से मिलेगी, उतनी दूसरी किसी चीज़ से नहीं मिल सकती। अपनी प्रान्तीय भाषाओं की भरपूर उन्नति कीजिए, उसमें कोई बाधा नहीं डालना चाहता और न हम किसी की बाधा को सहन ही कर सकते हैं। पर सारे प्रान्तों की सार्वजनिक भाषा का पद हिन्दी या हिन्दुस्तानी को ही मिला है।”
  • वर्ष 1931 ई. में गाँधीजी ने लिखा, “यदि स्वराज्य अंगेज़ी–पढ़े भारतवासियों का है और केवल उनके लिए है तो सम्पर्क भाषा अवश्य अंग्रेज़ी होगी। यदि वह करोड़ों भूखे लोगों, करोड़ों निरक्षर लोगों, निरक्षर स्त्रियों, सताए हुए अछूतों के लिए है तो सम्पर्क भाषा केवल हिन्दी हो सकती है।” गाँधीजी जनता की बात जनता की भाषा में करने के पक्षधर थे।
  • वर्ष 1936 ई. में गाँधीजी ने कहा, “अगर हिन्दुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है, क्योंकि जो स्थान हिन्दी को प्राप्त है, वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता है।”
  • वर्ष 1937 ई. में देश के कुछ राज्यों में कांग्रेस मंत्रिमंडल गठित हुआ। इन राज्यों में हिन्दी की पढ़ाई को प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया गया।
  • जैसे–जैसे स्वतंत्रता संग्राम तीव्रतम होता गया वैसे–वैसे हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया। 20वीं सदी के चौथे दशक तक हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में आम सहमति प्राप्त कर चुकी थी। वर्ष 1942 से 1945 का समय ऐसा था जब देश में स्वतंत्रता की लहर सबसे अधिक तीव्र थी, तब राष्ट्रभाषा से ओत–प्रोत जितनी रचनाएँ हिन्दी में लिखी गईं उतनी शायद किसी और भाषा में इतने व्यापक रूप से कभी नहीं लिखी गई। राष्ट्रभाषा प्रचार के साथ राष्ट्रीयता के प्रबल हो जाने पर अंग्रेज़ों को भारत छोड़ना पड़ा।
राष्ट्रभाषा आंदोलन (हिन्दी आंदोलन) से सम्बन्धित धार्मिक–सामाजिक संस्थाएँ
नाम मुख्यालय स्थापना संस्थापक
ब्रह्म समाज कलकत्ता 1828 ई. राजा राममोहन राय
प्रार्थना समाज बंबई 1867 ई. आत्मारंग पाण्डुरंग
आर्य समाज बंबई 1875 ई. दयानन्द सरस्वती
थियोसॉफिकल सोसायटी अडयार, चेन्नई 1882 ई. कर्नल एच.एस.आल्काट एवं मैडम एच.पी.ब्लैवेत्स्की
सनातन धर्म सभा वाराणसी 1895 ई. पं. दीनदयाल शर्मा
(भारत धर्म महामंडल-1902 में नाम परिवर्तन) रामकृष्ण मिशन बेलूर 1897 ई. विवेकानंद
राष्ट्रभाषा आंदोलन से सम्बन्धित साहित्यिक संस्थाएँ
नाम मुख्यालय स्थापना
नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी 1893 ई. (संस्थापक-त्रयी—श्यामसुंदर दास, रामनारायण मिश्र व शिवकुमार सिंह)
हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग 1910 ई. (प्रथम सभापति– मदन मोहन मालवीय)
गुजरात विद्यापीठ अहमदाबाद 1920 ई.
हिन्दुस्तानी एकेडमी इलाहाबाद 1927 ई.
दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा (पूर्व नाम- हिन्दी साहित्य सम्मेलन) चेन्नई 1927 ई.
हिन्दी विद्यापीठ देवघर 1929 ई.
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा 1936 ई.
महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा पुणे 1937 ई.
बंबई हिन्दी विद्यापीठ बंबई 1938 ई.
असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति गुवाहाटी 1938 ई.
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद पटना पटना 1951 ई.
अखिल भारतीय हिन्दी संस्था संघ 1964 ई.
नागरी लिपि परिषद नई दिल्ली 1975 ई.
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