रामभक्ति

रामभक्ति पंथी शाखा के प्रमुख कवि
रामानन्द, तुलसीदास, स्वामी अग्रदास, नाभादास, प्राणचंद चौहान, हृदयराम, केशवदास, सेनापति।
 
स्वामी रामानन्द
 
स्वामी रामानन्द का जन्म 1299ई. में माघकृष्णसप्तमी को प्रयाग में हुआ था। इनके पिता का नाम पुण्यसदनऔर माता का नाम सुशीला देवी था। इनका बाल्यकाल प्रयाग में बीता। यज्ञोपवीत संस्कार के उपरान्त वे प्रयाग से काशी चले आए और गंगा के किनारे पंचगंगाघाट पर स्थायी रूप से निवास करने लगे। इनके गुरु स्वामी राघवानन्द थे जो रामानुज (अचारी) संप्रदाय के ख्यातिलब्ध संत थे। स्वामी राघवानन्द हिन्दी भाषा में भक्तिपरककाव्य रचना करते थे। स्वामी रामानन्द को रामभक्तिगुरुपरंपरासे मिली। हिंदी भाषा में लेखन की प्रेरणा उन्हें गुरुकृपासे प्राप्त हुई। पंचगंगाघाटपर रहते हुए स्वामी रामानुज ने रामभक्तिकी साधना के साथ-साथ उसका प्रचार और प्रसार भी किया। स्वामी रामानन्द ने जिस भक्ति-धारा का प्रवर्तन किया, वह रामानुजीपरंपरा से कई दृष्टियोंसे भिन्न थी। रामानुजी संप्रदाय में इष्टदेव के रूप में लक्ष्मीनारायण की पूजा होती है। स्वामी रामानन्द ने लक्ष्मीनारायण के स्थान पर सीता और राम को इष्टदेव के आसन पर प्रतिष्ठित किया। नए इष्टदेव के साथ ही स्वामी रामानन्द ने रामानुजीसंप्रदाय से अलग एक षडक्षरमंत्र की रचना की। यह मंत्र है- रांरामायनम:। इष्टदेव और षडक्षरमंत्र के अतिरिक्त स्वामी रामानन्द ने इष्टोपासनापद्धतिमें भी परिवर्तन किया। स्वामी रामानन्द ने रामानुजीतिलक से भिन्न नए ऊ‌र्ध्वपुण्डतिलक की अभिरचनाकी। इन भिन्नताओंके कारण स्वामी रामानन्द द्वारा प्रवर्तित भक्तिधारा को रामानुजी संप्रदाय से भिन्न मान्यता मिलने लगी। रामानुजीऔर रामानन्दी संप्रदाय क्रमश:अचारीऔर रामावत नाम से जाने जाने लगे। रामानुजीतिलक की भांति रामानन्दी तिलक भी ललाट के अतिरिक्त देह के ग्यारह अन्य भागों पर लगाया जाता है। स्वामी रामानन्द ने जिस तिलक की अभिरचनाकी उसे रक्तश्रीकहा जाता है। कालचक्र में रक्तश्रीके अतिरिक्त इस संप्रदाय में तीन और तिलकोंकी अभिरचनाहुई। इन तिलकोंके नाम हैं, श्वेतश्री(लश्करी), गोलश्री(बेदीवाले) और लुप्तश्री(चतुर्भुजी)। इष्टदेव, मंत्र, पूजापद्धतिएवं तिलक इन चारों विंदुओंके अतिरिक्त स्वामी रामानन्द ने स्वप्रवर्तितरामावत संप्रदाय में एक और नया तत्त्‍‌व जोडा। उन्होंने रामभक्तिके भवन का द्वार मानव मात्र के लिए खोल दिया। जिस किसी भी व्यक्ति की निष्ठा राम में हो, वह रामभक्त है, चाहे वह द्विज हो अथवा शूद्र, हिंदू हो अथवा हिंदूतर।वैष्णव भक्ति भवन के उन्मुक्त द्वार से रामावत संप्रदाय में बहुत से द्विजेतरऔर हिंदूतरभक्तों का प्रवेश हुआ। स्वामी रामानन्द की मान्यता थी कि रामभक्तिपर मानवमात्र का अधिकार है, क्योंकि भगवान् किसी एक के नहीं, सबके हैं-सर्वे प्रपत्तिरधिकारिणोमता:।ज्ञातव्य है कि रामानुजीसंप्रदाय में मात्र द्विजाति(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) को ही भगवद्भक्तिका अधिकार प्राप्त है। स्वामी रामानन्द ने रामभक्तिपर मानवमात्र का अधिकार मानकर एक बडा साहसी और क्रान्तिकारी कार्य किया था। इसके लिए उनका बडा विरोध भी हुआ। स्वामी रामानन्द का व्यक्तित्व क्रान्तिदर्शी,क्रान्तिधर्मीऔर क्रान्तिकर्मीथा। उनकी क्रान्तिप्रियतामात्र रामभक्तितक ही सीमित नहीं थी। भाषा के क्षेत्र में भी उन्होंने क्रान्ति का बीजारोपण किया। अभी तक धर्माचार्य लेखन-भाषण सारा कुछ देवभाषा संस्कृत में ही करते थे। मातृभाषा होते हुए भी हिंदी उपेक्षत-सीथी। ऐसे परिवेश में स्वामी रामानन्द ने हिंदी को मान्यता देकर अपनी क्रान्तिप्रियताका परिचय दिया। आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास ने स्वामी रामानन्द की भाषा विषयक इसी क्रान्ति प्रियताका अनुसरण करके रामचरितमानस जैसे अद्भुत ग्रंथ का प्रणयन हिंदी भाषा में किया। ऐसा माना जाता है कि स्वामी रामानन्द विभिन्न परिवेशों के बीच एक सेतु की भूमिका का निर्वाह करते थे। वे नर और नारायण के बीच एक सेतु थे; शूद्र और ब्राह्मण के बीच एक सेतु थे; हिन्दू और हिंदूतरके बीच एक सेतु थे; देवभाषा (संस्कृत) और लोकभाषा(हिन्दी) के बीच एक सेतु थे। स्वामी रामानन्द ने कुल सात ग्रंथों की रचना की, दो संस्कृत में और पांच हिंदी में।
उनके द्वारा रचित पुस्तकों की सूची इस प्रकार है:
(1) वैष्णवमताब्जभास्कर: (संस्कृत), (2) श्रीरामार्चनपद्धति:(संस्कृत), (3) रामरक्षास्तोत्र(हिंदी), (4) सिद्धान्तपटल(हिंदी), (5) ज्ञानलीला(हिंदी), (6) ज्ञानतिलक(हिन्दी), (7) योगचिन्तामणि(हिंदी)।
 
ऐसा माना जाता है कि लगभग एक सौ ग्यारह वर्ष की दीर्घायु में स्वामी रामानन्द ने भगवत्सायुज्यवरणकिया। जीवन के अंतिम दिनों में वे काशी से अयोध्या चले गए। वहां वे एक गुफामें प्रवास करने लगे। एक दिन प्रात:काल गुफासे शंख ध्वनि सुनाई पडी। भक्तों ने गुफामें प्रवेश किया। वहां न स्वामी जी का देहशेषऔर न शंख। वहां मात्र पूजासामग्रीऔर उनकी चरणपादुका। भक्तगण गुफासे चरणपादुका काशी ले आए और यहां उसे पंचगंगाघाटपर स्थापित कर दिया। जिस स्थान पर चरणपादुका की स्थापना हुई, उसे श्रीमठकहा जाता है। श्रीमठपर एक नए भवन का निर्माण सन् 1983ई. में किया गया। स्वामी रामानन्द की गुरु शिष्य परम्परा से ही तुलसीदास, स्वामी अग्रदास, नाभादास जैसे रामभक्त कवियो का उदय हुआ।
 
 
गोस्वामी तुलसीदास
 
गोस्वामी तुलसीदास के जन्म काल के विषय में एकाधिक मत हैं. बेनीमाधव दास द्वारा रचित ‘गोसाईं चरित’ और महात्मा रघुबरदास कृत ‘तुलसी चरित’ दोनों के अनुसार तुलसीदास का जन्म 1497 ई. में हुआ था. शिवसिंह सरोज के अनुसार सन् 1526 ई. के लगभग हुआ था. पं. रामगुलाम द्विवेदी इनका जन्म सन् 1532 ई. मानते हैं. यह निश्चित है कि ये महाकवि 16वीं शताब्दी में विद्यमान थे.
तुलसीदास मध्यकाल के उन कवियों में से हैं जिन्होंने अपने बारे में जो थोड़ा-बहुत लिखा है, वह बहुत काम का है.
तुलसी का बचपन घोर दरिद्रता एवं असहायवस्था में बीता था. उन्होंने लिखा है, माता-पिता ने दुनिया में पैदा करके मुझे त्याग दिया. विधाता ने भी मेरे भाग्य में कोई भलाई नहीं लिखी.
 
मातु पिता जग जाइ तज्यो, विधि हू न लिखी कछु भाल भलाई I
जैसे कुटिल कीट को पैदा करके छोड़ देते हैं वैसे की मेरे माँ-बाप ने मुझे त्याग दिया:
 
तनु जन्यो कुटिल कीट ज्यों तज्यो माता पिता हू I
हनुमानबाहुक में भी यह स्पष्ट है कि अंतिम समय में वे भयंकर बाहु-पीड़ा से ग्रस्त थे. पाँव, पेट, सकल शरीर में पीड़ा होती थी, पूरी देह में फोड़े हो गए थे.
यह मान्य है कि तुलसीदास की मृत्यु सन् 1623 ई. में हुई.
उनके जन्म स्थान के विषय में काफी विवाद है. कोई उन्हें सोरों का बताता है, कोई राजापुर का और कोई अयोध्या का. ज्यादातर लोगों का झुकाव राजापुर की ही ओर है. उनकी रचनाओं में अयोध्या, काशी, चित्रकूट आदि का वर्णन बहुत आता है. इन स्थानों पर उनके जीवन का पर्याप्त समय व्यतीत हुआ होगा.
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 12 ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं.
कृतियां
1. दोहावली 2. कवितावली 3. गीतावली 4. रामचरितमानस 5. रामाज्ञाप्रश्न 6. विनयपत्रिका 7. रामललानहछू 8. पार्वतीमंगल 9. जानकीमंगल 10. बरवै रामायण 11. वैराग्य संदीपिनी 12. श्रीकृष्णगीतावली
 
नाभादास
 
नाभादास अग्रदासजी के शिष्य बड़े भक्त और साधुसेवी थे. सन् 1600 के लगभग वर्तमान थे और तुलसीदासजी की मृत्यु के बहुत पीछे तक जीवित रहे. इनका प्रसिद्ध ग्रंथ भक्तमाल सन् 1585 ई. के पीछे बना और सन् 1712 में प्रियादासजी ने उसकी टीका लिखी. इस ग्रंथ में 200 भक्तों के चमत्कार पूर्ण चरित्र 316 छप्पयों में लिखे गए हैं. इन चरित्रों में पूर्ण जीवनवृत्त नहीं है, केवल भक्ति की महिमासूचक बातें लिखी गई हैं. इनका उद्देश्य भक्तों के प्रति जनता में पूज्यबुद्धि का प्रचार जान पड़ता है. वह उद्देश्य बहुत अंशों में सिद्ध भी हुआ.
नाभाजी को कुछ लोग डोम बताते हैं, कुछ क्षत्रिय. ऐसा प्रसिद्ध है कि वे एकबार तुलसीदास से मिलने काशी गए. पर उस समय गोस्वामी ध्यान में थे, इससे न मिल सके. नाभाजी उसी दिन वृंदावन चले गए. ध्यान भंग होने पर गोस्वामीजी को बड़ा खेद हुआ और वे तुरंत नाभाजी से मिलने वृंदावन चल दिए. नाभाजी के यहाँ वैष्णवों का भंडारा था जिसमें गोस्वामीजी बिना बुलाए जा पहुँचे. गोस्वामीजी यह समझकर कि नाभाजी ने मुझे अभिमानी न समझा हो, सबसे दूर एक किनारे बुरी जगह बैठ गए. नाभाजी ने जान बूझकर उनकी ओर ध्यान न दिया. परसने के समय कोई पात्र न मिलता था जिसमें गोस्वामीजी को खीर दी जाती. यह देखकर गोस्वामीजी एक साधु का जूता उठा लिया और बोले, “इससे सुंदर पात्र मेरे लिए और क्या होगा ?” इस पर नाभाजी ने उठकर उन्हें गले लगा लिया और गद्-गद् हो गए.
अपने गुरू अग्रदास के समान इन्होंने भी रामभक्ति संबंधी कविता की है. ब्रजभाषा पर इनका अच्छा अधिकार था और पद्यरचना में अच्छी निपुणता थी.
कृति — 1. भक्तमाल 2. अष्टयाम
 
स्वामी अग्रदास
 
रामानंद के शिष्य अनंतानंद और अनंतानंद के शिष्य कृष्णदास पयहारी थे, कृष्णदास पयहारी के शिष्य अग्रदास जी थे. सन् १५५६ के लगभग वर्तमान थे. इनकी बनाई चार पुस्तकों का पता है. इनकी कविता उसी ढंग की है जिस ढंग की कृष्णोपासक नंददासजी की.
प्रमुख कृतियां है– 1. हितोपदेश उपखाणाँ बावनी 2. ध्यानमंजरी 3. रामध्यानमंजरी 4. राम-अष्ट्याम
अग्रदास जी का काव्य ब्रजभाषा मे है जिसमे प्रवाह के साथ परिष्कार भी है। सुंदर पद-रचना और अलंकारो के प्रयोग से यह प्रमाणित होता है कि इन्हें शास्त्रीय साहित्य का अच्छा ज्ञान था।
 
चौपाई:-
जीव मात्र से द्वैस न राखै। सो सिय राम नाम रस चाखै।१।
दीन भाव निज उर में लावै। सिया राम सन्मुख छवि छावै।२।
तौन उपासक ठीक है भाई। वाकी समुझौ बनी बनाई।३।
सियाराम निशि वासर ध्यावै। अन्त त्यागि तन गर्भ न आवै।४।
 
दोहा:-
अग्रदास कह धन्य सो, जाहि दियो गुरु ज्ञान।
सो तन लीन्हो सुफल कै, छूटा दुःख महान।१।
 
‘अग्रअली’ नाम से अग्रदास स्वयं को जानकी जी की सखी मानकर काव्य-रचना किया करते थे। रामभक्ति परम्परा में रसिक-भावना के समावेश का श्रेय इन्हीं को प्राप्त है।
 
हृदयराम
 
ये पंजाब के रहनेवाले और कृष्णदास के पुत्र थे. इन्होंने सन् 1623 में संस्कृत के हनुमन्नाटक के आधार पर भाषा हनुमन्नाटक लिखा जिसकी कविता बड़ी सुंदर और परिमार्जित है. इसमें अधिकतर कविता और सवैये में बड़े अच्छे संवाद हैं.
 
प्राणचंद चौहान
 
इनके व्यक्तित्व पर पर्याप्त विवरण नहीं मिलता है. पं. रामचंद्र शुक्ल जी के अनुसार:
संस्कृत में रामचरित संबंधी कई नाटक हैं जिनमें कुछ तो नाटक के साहित्यिक नियमानुसार हैं और कुछ केवल संवाद रूप में होने के कारण नाटक कहे गए हैं. इसी पिछली पद्धति पर संवत 1667 (सन् 1610ई.) में इन्होंने रामायण महानाटक लिखा.
 
कृति — 1. रामायण महानाटक
 
केशवदास
 
केशव का जन्म तिथि सं० १६१८ वि० मे वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य के अंतर्गत ओरछा नगर में हुआ था। ओरछा के व्यासपुर मोहल्ले में उनके अवशेष मिलते हैं। ओरछा के महत्व और उसकी स्थिति के सम्बन्ध में केशव ने स्वयं अनेक भावनात्मक कथन कहे हैं। जिनसे उनका स्वदेश प्रेम झलकता है। आचार्य केशव की रामभक्ति से सम्बन्धित कॄति “रामचंद्रिका” है।
“रामचन्द्रिका’ संस्कृत के परवर्ती महाकाव्यों की वर्णन-बहुल शैली का प्रतिनिधित्व करती है। “रामचन्द्रिका’ के भाव-विधान में शान्त रस का भी महत्वपूर्ण स्थान है। अत्रि-पत्नी अनसूया के चित्र से ऐसा प्रकट होता है जैसे स्वयं ‘निर्वेद’ ही अवतरित हो गया हो। वृद्धा अनसूया के कांपते शरीर से ही निर्वेद के संदेश की कल्पना कवि कर लेता है:
 
कांपति शुभ ग्रीवा, सब अंग सींवां, देखत चित्त भुलाहीं ।
जनु अपने मन पति, यह उपदेशति, या जग में कछु नाहीं ।।
 
अंगद-रावण में शान्त की सोद्देश्य योजना है। अंगद रावण को कुपथ से विमुख करने के लिए एक वैराग्यपूर्ण उक्ति कहता है। अन्त में वह कहता है – “चेति रे चेति अजौं चित्त अन्तर अन्तक लोक अकेलोई जै है।” यह वैराग्य पूर्ण चेतावनी सुन्दर बन पड़ी है।
 
सेनापति
 
हिंदी-साहित्य के इतिहास में ऐसे अनेक कवि हुए हैं जिनके कृतित्त्व तो प्राप्त हैं, परंतु व्यक्तित्त्व के विषय में कुछ भी ठीक से पता नहीं है। भक्तिकाल की समाप्ति और रीतिकाल के प्रारंभ के संधिकाल मे भी एक महाकवि हुए हैं जिनके जीवन के विषय में जानकारी के नाम पर मात्र उनका लिखा एक कवित्त ही है, ऐसे महाकवि ‘सेनापति’ के विषय में कवित्त है
“दीक्षित परसराम, दादौ है विदित नाम,
जिन कीने यज्ञ, जाकी जग में बढ़ाई है।
गंगाधर पिता, गंगाधार ही समान जाकौ,
गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है।
महाजानि मनि, विद्यादान हूँ कौ चिंतामनि,
हीरामनि दीक्षित पै तैं पाई पंडिताई है।
सेनापति सोई, सीतापति के प्रसाद जाकी,
सब कवि कान दै सुनत कविताई हैं॥”
 
यही कवित्त सेनापति के जीवन परिचय का आधार है। इसके आधार पर विद्वानों ने सेनापति के पितामह का नाम परसराम दीक्षित और पिता का नाम गंगाधर माना हैं। ‘गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है’ के आधार पर उन्हें उत्तर-प्रदेश के गंगा-किनारे बसे अनूपशहर क़स्बे का माना है। सेनापति के विषय में विद्वानों ने माना है कि उन्होंने ‘काव्य-कल्पद्रुम’ और ‘कवित्त-रत्नाकर’ नामक दो ग्रंथों की रचना की थी। ‘काव्यकल्पद्रुम’ का कुछ पता नहीं है। ‘कवित्तरत्नाकर’ उनकी एक मात्र प्राप्त कृति है। इस विषय में डॉ. चंद्रपाल शर्मा ने कहीं लिखा है-”सन १९२४ में जब प्रयाग विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन अध्यापन प्रारंभ हुआ, तब कविवर सेनापति के एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ ‘कवित्त-रत्नाकर’ को एम.ए. के पाठ्यक्रम में स्थान मिला था। उस समय इस ग्रंथ की कोई प्रकाशित प्रति उपलब्ध नहीं थी। अतः केवल कुछ हस्तलिखित पोथियाँ एकत्रित करके पढ़ाई प्रारंभ की थी।
कवि की निम्नलिखित पंक्तियों के आधार पर ‘कवित्त-रत्नाकर’ के विषय में माना जाता रहा है कि उन्होंने इसे सत्रहवीं शताब्दी के उतरार्ध में रचा होगा-
“संवत सत्रह सै मैं सेई सियापति पांय,
सेनापति कविता सजी, सज्जन सजौ सहाई।”
सेनापति कॄत ‘कवित्त-रत्नाकर’ की चतुर्थ तरंग में ७६ कवित्त हैं जिनमें रामकथा मुक्त रुप में लिखी है।-
“कुस लव रस करि गाई सुर धुनि कहि,
भाई मन संतन के त्रिभुवन जानि है।
देबन उपाइ कीनौ यहै भौ उतारन कौं,
बिसद बरन जाकी सुधार सम बानी है।
भुवपति रुप देह धारी पुत्र सील हरि
आई सुरपुर तैं धरनि सियारानि है।
तीरथ सरब सिरोमनि सेनापति जानि,
राम की कहनी गंगाधार सी बखानी है।”
पाँचवी तरंग में ८६ कवित्त हैं, जिनमें राम-रसायन वर्णन है। इनमें राम, कृष्ण, शिव और गंगा की महिमा का गान है। ‘गंगा-महिमा’ दृष्टव्य है-
“पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार,
जहाँ मरि पापी होत सुरपुरपति है।
देखत ही जाकौ भलौ घाट पहिचानियत,
एक रुप बानी जाके पानी की रहति है।
बड़ी रज राखै जाकौ महा धीर तरसत,
सेनापति ठौर-ठौर नीकी यैं बहति है।
पाप पतवारि के कतल करिबै कौं गंगा,
पुन्य की असील तरवारि सी लसति है।”
सेनापति ने अपने काव्य में सभी रसों को अपनाया है। ब्रज भाषा में लिखे पदों में फारसी और संस्कृत के शब्दों का भी प्रयोग किया है। अलंकारों की बात करें तो सेनापति को श्लेष से तो विशेष मोह था।
Advertisements
  1. Leave a comment

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: